Thursday, 5 September 2013

मैंने यह न जाना था


धरती पर जब जन्म लिया,
मैंने यह न जाना था,
माँ के बिना कोई जीवन है,
मैंने यह न पहचाना था...

पहला शब्द जब बोला था,
मैंने यह न जाना था,
शब्दों का जाल बुनना,
मेरी किस्मत में लिख जाना था...

पहला कदम जब चली थी,
मैंने यह न जाना था,
जीवन चलते रहना है,
रुकना मौत का ठिकाना था...

स्कूल जब पहले दिन गई,
मैंने यह न जाना था,
ज्ञान पाना मकसद नहीं,
उसे व्यवहार में लाना था...

अव्वल जब पहली बार आई,
मैंने यह न जाना था,
जीत के लिए हराना नहीं,
खुद आगे बढ़ जाना था...

नाची जब खुलकर बारिश में,
मैंने यह न जाना था,
सपनों को दबाना नहीं,
उनको पंख लगाना था...

दोस्त जब पहली बनाई थी,
मैंने यह न जाना था,
सिर्फ खुशियाँ बांटना दोस्ती नहीं,
एक-दुसरे के गम पी जाना था...

अब जब कई साल गुज़र गए,
अब मैंने यह जाना है,
अनुभव ही सिखाता है,
जीवन को ही शिक्षक बन जाना था...

आज शिक्षक दिवस पर,
तुम सबको यही बताना है,
हर जो व्यक्ति सफल है,
उसने स्वयं को ही शिक्षक माना है...

Wednesday, 14 August 2013

स्वतंत्र देश के बंधक नागरिक


आज स्वतंत्रता दिवस के दिन जब थोडा समय मिला तो मैंने अपनी और आस-पास के लोगों की ज़िन्दगी पर थोडा ध्यान दिया और शायद यहीं गलती हो गयी. अब तक स्वतंत्र होने का जो भ्रम था वो टूट गया. एक समय हुआ करता था जब इंसान खुद के साथ-साथ आने वाली पुश्तों के लिए भी कम लिया करता था और उसके साथ ही सभी दूर-दराज़ के रिश्तों को भी ज़िन्दगी भर साथ लेकर चलता था. पड़ोसियों और अनजाने लोगों से भी एक आत्मीयता का रिश्ता जोड़ लेता था. सुख-दुःख में मदद करने को हर दम तैयार...
...और आज समय है जब पड़ोस के घर में कौन रहता है यह तक नहीं पता होता. खुद का गुज़ारा करना तो मुश्किल है पुश्तों की सोचना तो पूरी तरह व्यर्थ है. रोज़ की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में जीवनसाथी को समय दे दें वही बहुत बड़ी बात है रिश्तेदारों या दोस्तों को मिलना तो अत्यंत मुश्किल है. ऐसी ज़िन्दगी को मैं तो बंधक की ज़िन्दगी ही कहूँगी जहाँ दिन-रात कमाने और अपने स्थान को बरक़रार रखने की जद्दोजहद चलती है. न दोस्तों से रूबरू होने की फुर्सत है न घर वालों के साथ बैठने का समय. न शौक पूरे करने की हिम्मत है न नई चीज़ों को सीखने का वक़्त. न पर्याप्त पैसा मिल पाता है और नाही निःस्वार्थ प्यार...
गौर से देखें तो यही पाएंगे कि इन सभी चीज़ों के पीछे उस ही सरकार का हाथ है जिसे चुनकर हमने अपने और अपनी आने वाली पुश्तों के लिए स्वतंत्रता और विकास सुनिश्चित करने की सोची थी. आज सरकार शासन और प्रशासन दोनों में ही पूरी तरह से नाकाम है. भ्रष्टाचार और दादागिरी ने ‘Government’ और ‘Administration’ दोनों को ही खोखला कर दिया है. महंगाई आसमान छू रही है...रूपये का अवमूल्यन हो रहा है...और पूरी सैलरी Taxes और EMI भरने में चली जाती है...
क्या आपको नहीं लगता कि अगर हम आयकर भरते हैं तो हमें हर उत्पाद या सेवा का भोग करते समय टैक्स नहीं लगना चाहिए...? यह तो बड़ी अजीब सी प्रथा है इस देश की कि हमें कमाते वक़्त भी सरकार को पैसे देने पड़ते हैं और खर्च करते वक़्त भी. इस तरह हम सिर्फ सरकार के हम्माल बन कर रह गए हैं जो उनके लिए दिन-रात कमाते हैं और टैक्स चुकाते हैं. हमारे लिए तो हम सिर्फ इतना कमा पाते हैं कि अपनी जीविका चला सकें...और सरकार को प्रति वर्ष अपनी कमाई में से न्यूनतम 50% देने के बाद भी हम किसी तरह के विकास या सुविधा की उम्मीद भी नहीं कर सकते. यह पैसा सिर्फ राजनीतिज्ञों और उनके भाई-बंधुओं की जेबों में जाता है और आज इसही लिए कोई भी छोटे से छोटा नेता भी 1000 करोड़ का असामी अवश्य होता है.

तो अब जब आज हमें राष्ट्रीय अवकाश मिला है, थोडा समय इस बात पर अवश्य चिंतन करें की हमें कैसी सरकार और कैसा शासन चाहिए और कोशिश कर अपनी आने वाली पीढ़ी को उस तरह के संस्कार देने का प्रयास करें ताकि हमारे देश को सिर्फ अच्छे डॉक्टर-इंजिनियर ही नहीं बल्कि अच्छे राजनेता भी मिलें!
#HappyIndependenceDay

Friday, 9 August 2013

आत्मा की शुद्धि के लिए तपस्या ज़रूरी


भारत कई धर्मों का देश है परन्तु धर्म जो भी हो, उसके पीछे की भावना एक ही होती है – ‘आत्मा की शुद्धि’. प्राचीन काल से यह आस्था रही है कि त्याग, समर्पण और तपस्या के माध्यम से इंसान ईश्वर के करीब पहुँचता है और उसके जीवन के दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं. इस मान्यता को आप हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हर धर्म में समान रूप से देख सकते हैं.
हिंदुओं में उपवास करना तो मुस्लिमों में रोज़े, इसही तरह आस्था और विश्वास की झलक हर त्यौहार में दिखाई देती है. रमज़ान के इस एक महीने के कड़े तप के दौरान मुस्लिम न सिर्फ अल्लाह की इबादत में डूबे होते हैं बल्कि उनकी शरण में जाने के लिए नियमित रूप से नमाज़ पढ़ते हैं और रोज़ा करते हैं. श्रद्धा के इस रूप को देखकर मन को अलौकिक सुकून की प्राप्ति होती है. ईद इसही तपस्या के पूरे होने पर उत्सव के रूप में मनाई जाती है.

मैं सभी रोजदारों को उनकी तपस्या और आत्मअन्वेषण के सफर के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर बधाई देना चाहती हूँ और सभी देशवासियों को मेरी ओर से ईद मुबारक!

Wednesday, 31 July 2013

An Escape from Extreme

From passion to possession

We experience extreme,

From mother's warmth to soulmate's love

We feel extreme,

From education to profession

We face extreme,

From strangers to friendship

We create extreme,

From summers to winters

We enjoy extreme,

From deserts to glaciers

We cherish extreme,

From nature to architecture

We love extreme,

From childhood to oldage

We live extreme…

Is there any escape to it?

We have always heard that extreme is never good in anything and everything but escape from extreme is really not possible. I find extreme in everything, do you find the same?

Sunday, 21 July 2013

Pilgrimage - A Journey from World to Oneself!

Recently I went for a Teerth Yatra at Bawangaja ji, Jain Pilgrimage near Badwani. There for the first time I met myself. Have you ever noticed that all the pilgrimage places are at distant places where humans have to make real efforts for having darshan. Either we talk about Amaranth, Badrinath, Kedarnath, Shikharji, Girnarji, Maangi-Tungi, Palitana or Bawangajaji, every teerth is really difficult to complete. It is just a strong will power that makes people strong enough to complete the yatra.

During Bawangaja ji yatra, when I was climbing the hill, I could hear my heartbeat loud enough. I think that's the first time I heard my heart this loud. In the way to reach pinnacle, I was remembering each and every person and the moments that touched my heart, a feeling that I will never forget, a desire that is yet incomplete & a dream that I want to fulfill before I die.

Truly, for me Pilgrimage is 'A Journey from World to Oneself'. What's your say on this?

Friday, 12 July 2013

Does your boyfriend deserve you?



Hey Dear!
You might have never asked this question to yourself and might be you are completely devoted in a relationship. But if you want to carry your relationship to the next level don’t skip this question. Ask this question to yourself. It might help you in saving yourself from the future guilt and a forced relationship. And if you really trust your relationship then get confident after taking a small test and analyzing the strength of your bond. Here I am suggesting you few questions which you must ask yourself to know the right answer of the above question –
·         Is he caring enough to keep you happy always?
·         Does he know the art of making you smile even when you are crying?
·         Is he keen to make all your dreams come true or to give you the life you want?
·         What’s your number in his priority list?
·         Is he ready to be committed with you emotionally, mentally, physically and socially?
Just ask these five questions and don’t cheat yourself. Be truthful while answering the questions to know the correct answer of ‘Does your boyfriend deserve you?’

I wish you all the best for the test and may you get the best man who actually deserves you! Have a great life!